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केजरीवाल के "कारनामे" बोल रहे हैं

Posted On: 10 Mar, 2017 Junction Forum में

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जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स यूनियन (JNUSU) का भूतपूर्व अध्यक्ष कन्हैयाकुमार, जिस पर देशद्रोह और आपराधिक षड्यंत्र जैसी धाराओं में मुकदमा दर्ज करके फरवरी२०१६ में उसे हिरासत में ले लिया गया था, दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने //२०१६ के एकफैसले में उसे सशर्त जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया था और वह आज तक जमानतपर रिहा है. काफी पाठकों के मन में यह सवाल उठ रहा होगा कि यह घटना तो लगभग एकसाल पहले की है, इसका जिक्र मैं आज एक साल बाद क्यों कर रहा हूँ. इस सवाल का जबाबपाठकों को यह पूरा लेख पढ़ने के बाद अपने आप ही मिल जाएगा. दिल्ली हाई कोर्ट काकन्हैया को जमानत पर रिहा करने वाला फैसला अपने आप में ऐतिहासिक था -यह २३ पेजका फैसला है और इसमें ५७ पैराग्राफ्स हैं. कोर्ट ने कन्हैया को जमानत पर रिहा करते समयकुछ सख्त टिप्पणियां JNU के छात्रों और वहां पढ़ा रहे अध्यापकों पर भी की थी, उन सभीका जिक्र यहाँ इस लेख में करना संभव नहीं है. मीडिया को यहसख्त टिप्पणियांइतनीनागवार लगी थीं, कि काफीवरिष्ठ पत्रकारोंने उसके खिलाफ उस समय लेख भी लिखे थेऔर कुछेक अख़बारों ने तो हाई कोर्ट कि इन सख्त टिप्पणियों की आलोचना करते हुएसंपादकीय ही लिख मारे थे.


JNU के साबरमती ढाबा पर फरवरी २०१६ को एक कार्यक्रम आयोजित किये जाने कीयोजना थी. कार्यक्रम का नाम रखा गया था-“POETERY READING-A COUNTRY WITHOUT A POST OFFICE”. कार्यक्रम के नाम में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं थाऔर इसीलिए यूनिवर्सिटी प्रशासन ने इसकी इज़ाज़त दे दी थी. जब कार्यक्रम शुरू हुआ औरवहां पर पोस्टर, फोटो और वीडियो सामग्री देखकर यूनिवर्सिटी प्रशासन को लगा कि यह देशद्रोह का मामला हो सकता है और उन्होंने आनन फानन में इस प्रोग्राम की परमिशन कोवापस ले लिया. इसके बाद वहां जो कुछ भी हंगामा हुआ, उसमे हाई कोर्ट के आदेश के पैरासंख्या ३० के मुताबिक-”पुलिस ने मौका--वारदात से जो पोस्टर,फोटो और विडियो सामग्रीबरामद की, उनमे नीचे लिखे हुए नारों का जिक्र था :


. अफ़ज़ल गुरु मकबूल भट्ट जिंदाबाद

.भारत की बर्बादी तक जंग रहेगी जंग रहेगी.

. गो इंडिया गो बैक

.इंडियन आर्मी मुर्दाबाद

.भारत तेरे टुकड़े होंगे-इंशाअल्लाह इंशा अल्लाह

.अफ़ज़ल की हत्या नहीं सहेंगे-नहीं सहेंगे

- बन्दूक की दम पर लेंगे आज़ादी


हाई कोर्ट के आर्डर में बहुत सारी सख्त टिप्पणियों में से कुछ का यहां जिक्र करना जरूरी है :

* पैरा ३९ में कोर्ट लिखता है-” यह सभी को ध्यान रखना चाहिए कि जिसअभिव्यक्ति कीआज़ादी” की हम बात कर रहे हैं, वह हमें तभी तक मिली हुयी है, जब तक हमारी सेनाएंसियाचीन ग्लेशियर जैसे दुर्गम इलाकों में सीमा पर खड़े होकर हमारी रक्षा कर रही हैं. “

* पैरा ४१ में कोर्ट आगे लिखता है :” कुछ लोग यूनिवर्सिटी कैम्पस के सुरक्षित माहौल में बड़ेआराम से देशद्रोही नारे इसलिए लगा पा रहे हैं , क्योंकि हमारी सेनाएं दुनिया की सबसे ऊंचीजगह पर, जहां ऑक्सीजन भी मुश्किल से उपलब्ध हैं, खड़े होकर दिन रात हमारी रक्षा कररही हैं. जो लोग देशद्रोही नारे लगा रहे हैं और जो अफ़ज़ल गुरु मकबूल भट्ट के पोस्टरों कोअपने सीने से लगाकर इन लोगों को शहीद बताकर इनका सम्मान कर रहे हैं, यह सब लोगऐसे दुर्गम इलाकों में एक घंटे भी खड़े नहीं हो सकते, जहां हमारी सेनाएं खड़ी होकर हमारीहिफाज़त कर रही हैं.”

*पैरा ४७ में कोर्ट आगे लिखता है : ” इस कार्यक्रम में जिस तरह के विचार व्यक्त किये गएऔर जिस तरह के पोस्टर बरामद हुए हैं, उन्हेंअभिव्यक्ति की आज़ादीजैसे मूलभूतअधिकारों से जोड़कर नहीं देखा जा सकता है. यह एक तरह का संक्रामक रोग है, जिसकोअगर तुरंत नहीं रोक गया तो यह एक महामारी का रूप धारण कर लेगा.”

* पैरा ४८ में कोर्ट आगे लिखता है :” जब कोई रोग शरीर के किसी अंग में इस तरह सेसंक्रमित हो जाए, तो पहले उसे खिलाने वाली दवाओं से ठीक करने की कोशिश करनी पड़ेगीऔर अगर फिर भी इसका इलाज़ नहीं हुआ तो इसके लिएसर्जरीका ही उपाय अपनाना पड़ेगा.”


ऐसी बहुत सारी टिप्पड़ियां इस आर्डर में हैं, सभी का उल्लेख कर पाना यहां संभव नहीं है.सभी को यह पूरा आर्डर एक बार पढ़ना जरूर चाहिए. मेरे पास इस आर्डर की पी डी ऍफ़ कॉपीउपलब्ध है और किसी पाठक को चाहिए तो उसे मैं -मेंल से भिजवा सकता हूँ. यह आर्डर सर्चकरने पर गूगल पर भी मिल जाएगा.अभी तक इस लेख में जो कुछ भी लिखा गया है, उसके बारे में पाठकों को कुछ कुछ अंदाजापहले से ही जरूर रहा होगा. लेकिन जो बात अब आगे लिखी जा रही है, वह काफी चौंकानेवाली है .


().कन्हैया की जमानत की पैरवी देश के १० बड़े जाने माने नामी और महंगे वकील जिनमेकपिल सिबल भी शामिल हैं, कर रहे थे. कोर्ट में कन्हैया ने खुद यह माना था कि उसकी कुलपारिवारिक आमदनी मात्र ३००० रूपये महीना थी. इस मामूली सी आमदनी में कन्हैया ने इनवकीलों का इंतज़ाम कैसे किया और हाथ में आई फ़ोन लेकर हवाई यात्रायें कैसे कीं, यह अपनेआप में एक यक्ष प्रश्न बना हुआ है.


().पैर संख्या के मुताबिक कन्हैया ने अपनी जमानत के लिए यह दलील दी-” कि उसकीअब इस केस की छानबीन के लिए जरूरत नहीं है.” पैरा संख्या १७ में कन्हैया के वकीलकपिल सिबल भी यही बात दोहराते हुए कन्हैया को जमानत पर रिहा करने का निवेदन करतेहैं. पैरा संख्या २४ में सरकार की तरफ से ASG तुषार मेहता ने कन्हैया को जमानत दिएजाने का जोर शोर से विरोध किया. लेकिन सभी को हैरानी में डालते हुए दिल्ली सरकार केवकील राहुल मेहरा ने आर्डर के पैरा संख्या २५ के मुताबिक , कन्हैया की जमानत का विरोधकरने कि बजाये क्या कहा, उसे जरा देखिये : ” मामले के तथ्यों और हालात को देखते हुएकन्हैया कुमार को जमानत पर रिहा कर दिया जाए.”


() दिल्ली सरकार एक जनता के द्वारा चुनी हुयी सरकार है और जनता के पैसों से चल रहीहैं. क्या दिल्ली सरकार इस मामले में कन्हैया की पैरवी दिल्ली की जनता के खर्चे पर कर रहीथी ? केजरीवाल सरकार के इसअभूतपूर्व , अद्भुत और क्रांतिकारी कारनामे” पर किसीवरिष्ठ पत्रकारया अखबार ने कोई लेख या संपादकीय पूरे एक साल में एक बार भी लिखकर क्या मीडिया की साख को दांव पर नहीं लगा दिया है ?


() केजरीवाल सरकार द्वारा दिल्ली की जनता से टैक्स के रूप में वसूली हुयी रकम सेकन्हैया जैसे लोगों की पैरवी किये जाने पर केंद्र सरकार मौन क्यों है ?



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