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गाजियाबाद ट्रैफिक पुलिस की गुंडागर्दी

Posted On: 16 Dec, 2017 में

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घटना १७ अक्टूबर २०१७ की है. धनतेरस वाला दिन था . गाज़ियाबाद के वैशाली सेक्टर ४ से मेरी कार मेरे घर इंदिरापुरम आ रही थी. मैं घर पर ही था. गाड़ी मेरा ड्राइवर चला रहा था. लगभग ४ बजे शाम को ड्राइवर का फ़ोन आया कि ट्रैफिक कांस्टेबल रविंदर सिंह मेरी कार के कागज़ात लेकर भाग गया है और यह कह गया है कि कागज़ लेने के लिए निकटतम पुलिस चौकी पर आ जाना.


मुझे कुछ माजरा समझ नहीं आया इसलिए मैंने ड्राइवर से और पूछताछ की. उसने फिर बताया कि जब वह कौशाम्बी से वैशाली सेक्टर ४ से गुजर रहा था तो वहां त्यौहार होने की वजह से जबरदस्त भीड़ भाड़ और जाम लगा हुआ था और उसीके चलते सभी गाड़ियां बहुत धीरे धीरे रेंग रेंग कर चल रही थीं. जब उसकी गाड़ी को रोककर ट्रैफिक कांस्टेबल रविंदर सिंह ने कागज़ात मांगे तो ड्राइवर ने यह समझ कर उसे गाड़ी के कागज़ पकड़ा दिए कि जांच करने के बाद यह कागज़ उसे वापस कर दिए जाएंगे. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. गाड़ी के कागज़ों में कोई कमी नहीं मिली. इससे शायद कांस्टेबल बहुत मायूस हो गया. उसने गाड़ी के बाकी कागज़ वापस करते हुए, गाड़ी का पंजीकरण प्रमाण पत्र (रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट) अपने पास यह कहकर रख लिया कि इसे चौकी से आकर ले जाना.


मुझे अभी भी मामला समझ में नहीं आया और मैं खुद ही अपने घर इंदिरापुरम से वैशाली की तरफ निकल पड़ा. १५-२० मिनट बाद जब मैं वैशाली पहुंचा और ड्राइवर के साथ ट्राफिक कांस्टेबल रविंदर सिंह के पास पहुंचा तो वह पहले ही किसी दूसरी गाड़ी के ड्राइवर के साथ गर्म बहस में लगा हुआ था. खैर जब उससे निपटा तो उसने मेरी तरफ देखा. मैंने उससे पूछा कि भाई आपने मेरी गाड़ी का रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट क्यों और कैसे अपने पास रख लिया तो वह एकदम भड़क गया और बोला कि अब मैं बताऊंगा कि मैंने गाड़ी का रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट क्यों रख लिया -अब मैं “नो पार्किंग” का चालान बनाऊंगा और गाड़ी के रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट को जब्त कर लूँगा जिसे आप जाकर गाज़ियाबाद पुलिस के दफ्तर जाकर वहां जुर्माना भरकर वापस ला सकते हो. जब मैंने उससे कहा कि गाड़ी अगर “नो पार्किंग” में थी और उसका चालान ही काटना था तो पहले ही काट देना था. इस बात का इंतज़ार क्यों कर रहे थे कि मैं यहां आऊंगा तब तुम चालान काटोगे. लेकिन उसने मेरी एक न सुनी और पास खड़े एक दूसरे पुलिस कर्मचारी कंचन सिंह की शह पर वेवजह ही चालान काट दिया.


इस सारे मामले को विस्तार में लिखकर मैंने गाज़ियाबाद ट्रैफिक पुलिस के आला अधिकारियों से शिकायत दर्ज़ कराई लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला. इसके बाद मैंने मुख्यमंत्री के “जनसुनवाई” पोर्टल पर शिकायत दर्ज़ कराई. लेकिन जनसुनवाई पोर्टल पर भी किसी तरह से खाना पूर्ति करते हुए मामले को रफा दफा करके आरोपी कांस्टेबल रविंदर सिंह को “क्लीन चिट” दे दी और साथ में उल्टा मेरे ऊपर यह आरोप लगा दिया कि शिकायत करने वाले ने यह शिकायत किसी दुर्भावना वश दर्ज़ कराई है.


अगर मुख्यमंत्री के “जनसुनवाई” पोर्टल पर शिकायतों का निपटारा इस तरह से होता है तो फिर शिकायत करने के इस माध्यम पर अपने आप ही कई सवालिया निशान लग जाते हैं. यह ठीक है कि उत्तर प्रदेश में पुलिस और कानून व्यवस्था पिछली बसपा और सपा सरकारों के समय में पूरी तरह मरणासन्न हो चुकी थी, लेकिन प्रदेश में नयी भाजपा सरकार आने के बाद भी हालात जस के तस बने हुए हैं, यह बहुत ही चिंता और हैरानी का विषय है जिस पर अगर तुरंत ध्यान नहीं दिया गया तो हालात दिन ब दिन बाद से बदतर होते जाएंगे

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